KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

फिर भी अब मैं आदमी नया हूं(fir bhi ab mai aadami naya hu)

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बचपन अंधा सा बीत गया,
पर वो पल मैं जीत गया।
बाकी जिंदगी तो चलता फिरता ढर्रा  है। 
जिम्मेदारियों से भरी अपनी रोजमर्रा है ।
खुशी का माहौल छीना ये शहर
दिल पर हुक उठे जाने कैसा डर?
बालुओं में जो बनते थे घर
यादों से अश्रु आ जाते आंखों पर।
गांव की उस मिट्टी से
सौंधी सी महक आता ।
सुख के क्षण ताजे  होकर
मन अपना कही बहक जाता ।
पर आज देख लो
अपनों के बीच में पराया हूं।
मेरे कानों में गूंजती वह बातें
फिर भी अब मैं आदमी नया हूं

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