KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

बसंत बहार

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बसंत बहार

शरद फुहार जाने लगी
बसंती बहार आने लगी !
कोयल की कूक गुंजे चहुँ ओर
धीरे – धीरे धूप तेज कदम नें
बाग में आम बौराने लगी!


शाम ढ़ले चहचहाते पक्षियों
घोसला को लौटने झुंड में,
पेड़ों को पत्ते पीला होकर
एक – एक कर झड़ने लगी!
खेत खलिहान मे पुआल
गाय बकरी सुबह शाम तक
निश्चिंत हो चरने लगी!


आया बसंत बहार
लाया कविता बहार!


तेरस कैवर्त्य (आँसू)

सोनाडुला, बिलाईगढ़
छ. ग.

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