बसन्त आयो रे

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ताटंक छंद – गीत
*ऋतु बसन्त आयो रे*
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ऋतु बसन्त शुभ दिन आयो रे,
सबके मन को भायो रे।
पात-पात हरियाली सुन्दर,
मधु बन भीतर छायो रे।।

नीला अम्बर खूब सितारे
सबके मन को भाते हैं।
रक्त पलास खिले धरती पर,
तन में अगन लगाते हैं।
रंग-बिरंगे उपवन सुन्दर,
प्रकृति खूब हर्षायो रे।
ऋतु बसन्त खूब दिन आयो रे,……….।

आम्र बौर अमराई खिलकर,
पिय सन्देशा लाती है।
कामुकता का बाण चलाती,
कोयल गीत सुनाती है।।
शीतल मन्द पवन के झोंके,
मन आनन्द समायो रे।
ऋतु बसन्त शुभ दिन आयो रे,……….।

सरसों की लहराती फसलें,
दृश्य मनोरम सजते हैं।
फागुन के आने की आहट,
रंग बसन्ती लगते हैं।।
केशर की क्यारी की खुशबू,
मन उमंग बरसायो रे।
ऋतु बसन्त शुभ दिन आयो रे,………।
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छंदकार:-
बोधन राम निषादराज”विनायक”
सहसपुर लोहारा,जिला-कबीरधाम(छ.ग.)
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