KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

बेटी

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~~~~~~~~~बाबूलालशर्मा
*लावणी छंद*:-16,14 पर यति
दो पंक्तियाँ समतुकांत
(अंत में लघु गुरु बंधन नहीं)
.         ?‍? *बेटी* ?‍?
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बेटी है अनमोल धरा पर,
उत्तम अनुपम  सौगातें।
सृष्टि नियंता मात् पुरुष की,
ईश जनम जिससे पाते।
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बेटी से घर आँगन खिलता,
परिजन प्रियजन सब हित में।
इनका भी सम्मान करें ये
जीवन बाती परहित में।
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बेटी सबकी रहे लाड़ली,
सबको वह दुलराती है।
ईश भजन सी शुद्ध दुआएँ,
माँ बनकर सहलाती हैं।
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बेटी तो वरदान ईश का ,
जो दुख सुख को भी साधे।
बहिन बने तो आशीषों से,
रक्ष सूत बंधन बाँधे।
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मात पिता घर रोशन करती,
पिय घर जाकर उजियाली।
मकानात को घर कर देती,
घर लक्ष्मी ज्यों दीवाली।
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बेटी जिनके घर ना जन्मे,
लगे भूतहा वह तो घर।
जिस घर बेटी चिड़िया चहके,
उस घर में काहे का डर।
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मर्यादा बेटी से निभती,
बहु बनती है लाड़ो जब।
रीत प्रीत के किस्से कहती,
नानी दादी बनती तब।
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दुर्गा सी रण चण्डी बनती,
मातृभूमि की रक्षा को।
कौन भूलता भारत भू पर,
रानी झाँसी,इन्द्रा को।
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करे कल्पना अंतरिक्ष की,
सच में सुता कल्पना थी।
पेड़ के बदले शीश कटाए,
उनके संग अमृता थी।
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सिय सावित्री राधा मीरा,
रजिया पद्मा याद करो।
अनुराधा व लता के गीतों,
संगत भी आह्लाद भरो।
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शिक्षा और चिकित्सा देखो,
पीछे कब ये रहती हैं।
दिल दूखे तब पूछूँ सबसे,
अनाचार क्यों सहती है।
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जग जननी को गर्भ मारते,
हम ही तो सब दोषी हैं।
नारिशक्ति को जो अपमाने,
पूर्वाग्रह संपोषी है।
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बेटी का सम्मान करें हम,
नारि शक्ति को सनमाने।
विविध रूप संपोषे इनके,
सुता शक्ति को पहचाने।
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इनको बस इनका हक चाहे,
लाड़ प्यार अकसर दे दो।
आसमान छू लेंगी तय है,
बेटे ज्यों अवसर दे दो।
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✍✍?©
बाबू लाल शर्मा “बौहरा”
सिकंदरा,303326
दौसा,राजस्थान,9782924479
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