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भारत !तुझे आज तय करना है

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*भारत !तुझे आज तय करना है *
(रचयिता:-मनीभाई ‘नवरत्न’)



भारत !तुझे आज तय करना है ।
किस दिशा में उड़ान भरना है ?
अपने पूरब में सूरज उगे,
और पश्चिम में ढल जाता है ।
अब तू ही बता ,
पश्चिमी रीतियों में क्यों ढलना है ?
भारत !तुझे आज तय करना है ।।
तेरा संस्कृति ही तेरा अस्तित्व ,
जिसमें बसी सभ्यता का सौंदर्य ।
फिर पाश्चात्य को विकसित मान ,
संस्कृति का अपमान क्यों करना है?
भारत !तुझे आज तय करना है ।।
पवित्र संस्कारों की ओढ़नी बिन
आभूषणों की श्रृंगार होता है अधूरा ।
तो फिर नवीनता के चक्कर में
अपनी लोक मर्यादा क्यों खोना है ?
भारत !तुझे आज तय करना है ।।
माना सच का आसमान देखना है
तो खुला मैदान जाना ही होगा ।
पर जग में मानवता पाने को ,
हे भारत! तुझे भारत पर ही आना है।
भारत !तुझे आज तय करना है ।
किस दिशा में उड़ान भरना है ?
✒️मनीभाई’नवरत्न’, बसना महासमुंद छग