भावों का उमड़ता सागर(bhavo ka umadata sagar)

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*भावों का उमड़ता सागर*



इंसानों में कुछ नहीं
भावों का उमड़ता सागर है।
कभी खुश हो जाए,
जो छोटी सी बातों में
तो कभी बतलाता ,
गमों का टूटा पहाड़ है।
कभी शांत चित्त से ,
सब सह जाता ।
तो कभी ,
हिंसक शेर-सा दहाड़ है।।
ये सब आदतन दिखाते
चूंकि पूर्वज जिसके बंदर हैं।
इंसानों में कुछ नहीं
भावों का उमड़ता सागर है।
समझना कठिन है
जिनके स्वभावों को
उन्हें समझाना,
होता है दूना दूभर।
नासमझ जग में
जहां सब पर्दा में है
वहां जीते हैं ये
समझदार बनकर।
मरने-मारने की बात करते हैं
और कहते “सच्चा मेरा प्यार है।”
इंसानों में कुछ नहीं
भावों का उमड़ता सागर है।
कुछ देर चला
जो भी उनके
संग सफर में,
हमराही उसे जान लिया।
साथ छोड़ कर
अपनी राह हुए जो,
उसे बेवफा
खुदगर्ज मान लिया।
जानते हुए कि
हर किसी का अलग शहर है।
इंसानों में कुछ नहीं
भावों का उमड़ता सागर है।।

*✒मनीभाई”नवरत्न”छत्तीसगढ़*
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