मंथन

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मंथन


दूध का परिवर्तन दही।
दधि मंथन से ही तो प्राप्त होता,
नवनीत।
जो बनता कृष्ण कन्हैया का भोग।
दूध का सर्वोत्तम उपयोग।
देता है जीवनी शक्ति
बढाता, श्याम मय बालकों की
बल और बुद्धि ।
सहयोग व राष्ट्र भक्ति
विचारों का ज्वार
जो बदल देता, संसार की धारा
ढहा देता थोती मान्यताओं की दीवारें
उखाड़ता संशयों के जीर्ण वट को जड़ से
और चढ जाता ,मंतव्य की सीढियाँ।
छू लेता, सफलताओं के शिखर।
पाता दैव दैत्यों के
सम्मिलित प्रयास का फल
अमृत ।
जिससे पनपी देवसंस्कृति
सोचती सकल सृष्टिहित।
संभाला था शंकर ने
हलाहल विष
कहलाये फिर नीलकंठ।
आज भी आवश्यकता है
समाज में जगकल्याण चाहने वाले मनीषियों की।
अमरबेल से बढते विज्ञान
से उत्पन्न
विषाणुओं सी विस्तृत समस्याओं
के निवारण के लिये।
कर सके जो मंथन प्रयास
पी सके विरोध का गरल।
अमिय मय
सफलता सूत्रों की प्राप्ति के लिये।
जो रोक सके,
आते विनाश के विप्लव को
बाँध सके भीषण प्रवाह।
दे सके, संसृति को नया मोड़।
बढता हो जो निर्माण की ओर
सहज शान्ति ,आनंद की ओर।
पुष्पाशर्मा”कुसुम”

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