मझधार पर कविता -रेखराम साहू

kavita-bahar-hindi-kavita-sangrah

मझधार पर कविता -रेखराम साहू

जीवन,नौका है हम सबका, सरितावत् संसार है,
जन्म,मरण दो तट हैं इसके,और आयु मझधार है।

आत्मा,मन ये नाविक हैं दो,ये ही इसे चलाते हैं,
कुशल हुए तो पार लगाते,अकुशल हुए डुबाते हैं।
कर्म-धर्म से ही बनती इस नौका की पतवार है,
जीवन,नौका है हम सब का, सरितावत् संसार है।

मोह-मकर,मद-मीन तैरते,लोभ-क्षोभ लहराते हैं।
अंध वासना के भुजंग,क्रोधित हो फन फैलाते हैं।
अहंकार की आँधी चलती,छा जाता अँधियार है
जीवन नौका है हम सब का,सरितावत् संसार है।

भ्रम के भँवर बहुत गहरे हैं,नाव बचाना दुष्कर है,
सावधान होना ही,प्रतिपल होता सबसे हितकर है।
सद्गुरु के बिन और न कोई सच्चा खेवनहार है।
जीवन,नौका है हम सब का, सरितावत् संसार है।

रेखराम साहू (बिटकुला/बिलासपुर)

Leave A Reply

Your email address will not be published.