मां,,,(कविता, पदमा साहू)

 

 

विधा,, कविता

शीर्षक,,, मां

 

मां तुम धरा की अमूल्य धरोहर,

तुम होअद्भुत,अतुल्य जीवन निर्मात्री।

 

नौ माह कोख में रक्त से सींचती,

मां तुम हो बच्चों की जन्मदात्री।

मां तुम बच्चों की होती प्रथम गुरु,

जीवन रूपी पाठशाला की विधादात्री।

मां तुम धरा की अमूल्य धरोहर,,,,,,

 

मां के चरणों में निहित स्वर्ग,तीर्थ धाम सभी,

मां तुम हो करुणा, ममता की मूरत क्षमादात्री।

मां तुम तमस में आशा की किरण,

तुम हो संतान रक्षक, दुष्ट दलन कालरात्रि।

मां तुम धरा की अमूल्य धरोहर,,,,

 

शरद, ग्रीष्म, वर्षा को आंचल में समेटे,

मां तुम हो त्याग की देवी छांया दात्री।

मां तुम स्वयंअपनी क्षुधा भूलकर,

बच्चों की हो क्षुधातृप्त कराने वाली अन्नदात्री।

मां तुम धरा की अमूल्य धरोहर,,,,

 

मां तेरे गोरस का कर्ज हम पर,

जन्म जन्मांतर हो हम क्षमाप्रार्थी।

मां की गोद और आंचल पाने,

भगवान भी बन जाते हैं शरणार्थी।

मां तुम धरा की अमूल्य धरोहर,,,,

 

स्वरचित

श्रीमती पदमा साहू शिक्षिका

खैरागढ़ जिला राजनांदगांव छत्तीसगढ़

(Visited 54 times, 1 visits today)

This Post Has 4 Comments

  1. Shruti

    बहुत सुन्दर रचना…माँ ❣️

  2. Shruti

    बहुत ही सुंदर रचना।।।माँ….❤️

  3. Padma Sahu

    Bhut bhut aabhar

  4. श्रेयांश

    बहुत ही अच्छा लिखा है आपने मैडम जी ??

प्रातिक्रिया दे