मातु-वंदन

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.         *हरिगीतिका-छंद*
.             ( १४,१४)
.            ‘मातु-वंदन’
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निज माँ सभी,सबसे भली,
प्रभु आपकी, मन भावना।
जग में रहे, हर हाल में
  जन मानसी, सद् भावना।
यह फर्ज है, हर पूत का,
प्रण मात का, प्रतिपालना।
पद उच्च है, जननी सदा,
  मन मीत ये,सच जानना।
.      ….……
कर मात के, चरणों नमन,
  हम सोच लें, भगवान है।
पढ़ सीखलें, तम को मिटा,
   रख  याद माँ, वरदान है।
करना नहीं, अवमानना
  मन मान माँ, अरमान है।       
रखना भली, मन भावना,
  तन मात का, अहसान है।
.      ….….
पथ भान हो, यह ज्ञान हो,
  गुरु मात है,  सच बात है।
हर मात का, उपकार  है,
  बस मात ही, बस ज्ञात है।
शिशु पालती, तन वारती,
  यह मात ही, वह गात है।
मन मे सदा,सन मान हो,
  रब ने रची,  सौगात  है।
.     ….….
रखना सदा, सुख से सभी,
   अपना यही, सत धर्म है।
जिसने हमे, निज गर्भ में,
रख के किए, नित कर्म है।
करले सखे, यह पुण्य तू,
    हर तीर्थ का,यह मर्म है।

दुख झेलती,यदि मात तो,
.   अपने लिए, यह शर्म है।
. …….……          
✍©
RJ-1100/2018
बाबू लाल शर्मा”बौहरा”
सिकंदरा, 303326
दौसा,राजस्थान,9782924479
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