मातृशक्ति

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  *मातृशक्ति*  
.  (लावणी 路‍♀ छंद)
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जननी आँचल,भूमि धरातल,
पावन भावन होता है।
मानस करनी दैत्य सरीखी,
अहसासो को खोता है।
路‍♀
मानव तन को माँ आजीवन,
भू ने भी माँ सम पाला।
बन,दानव तुमने वसुधा में,
तीव्र हलाहल क्यूँ डाला।
路‍♀
मानव  ने  खो दी  मानवता,
छुद्र स्वार्थ के फेरों में।
बना हुआ अस्तित्व मात का,
आशंका के घेरों में।
路‍♀
वसुधा का शृंगार छीन कर,
जन, वन पेड़ काट डाले।
जल,खनिजों का अति दोहन कर,
माँ के तन मन दे छाले।
路‍♀
मात् मुकुट से मोती छीने,
पर्वत नंगे जीर्ण किए।
मानव  घायल होती माता,
उन घावों को कौन सिंए।
路‍♀
अमृत मात् के नस नस बहता,
सरिताएँ  दूषित कर दी।
मलयागिरि सी पवन धरा पर,
उसे  प्रदूषित क्यूँ  कर दी।
路‍♀
मातृशक्ति गौरव अपमाने,
ओ मन,भोले अपराधी।
जिस माता को आर्य सभ्यता,
देव शक्ति ने आराधी।
路‍♀
मिला मनुज तन दैव दुर्लभम्,
“वन्य भेड़िये”  क्यों बनते हो।
अपनी माँ अरु बहिन बेटियां,
उनको तुम क्यों छलते हो।
路‍♀
माँ की सुषमा नष्ट करे नित,
कंकरीट से उसको क्यों भींचे।
मातृ शक्ति की पैदाइश हो,
शुभ्र केश फिर क्यों खींचे।
路‍♀
ताल तलैया सागर,नाड़ी,
नदियों को मत अपमानो।
क्षिति,जल,पावक,गगन,समीरा,
इनसे  मिल जीवन मानो।
路‍♀
माँ तो दुर्लभ अमरित फल है,
समझ सको तो कद्र करो।
माँ की सेवा सात धाम फल,
भव सागर से पार तरो।
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✍©
बाबू लाल शर्मा “बौहरा”
सिकन्दरा  303326
दौसा,राजस्थान 9782924479
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