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मुझे तेरे करम का एहसास हो – कविता – मौलिक रचना – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

इस रचना में कवि उस खुदा के करम और रहम का एहसास कर रहा है |
मुझे तेरे करम का एहसास हो – कविता – मौलिक रचना – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

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मुझे तेरे करम का एहसास हो – कविता – मौलिक रचना – अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”

मुझे तेरे करम का एहसास हो
तू यहीं कहीं मेरे आसपास हो

थक जाऊं तो सहारा देना
गिरने जो लगूं तो संभाल लेना

तेरे रहमत तेरे करम का साया हो
या मै यहाँ रहूँ या वहाँ रहूँ

किस्सा ए जिंदगी सुकून से चले
हर वक्त तेरा नाम मेरी जुबान पे रहे

कि जागूं तो बसर रह जुबान पे मेरी
और जुस्तजू तेरी ख्वाब में भी बरकरार रहे

तूने खिलाया है सभी को गोदी में लेकर
तेरा ये प्यार हम पर भी बरकरार रहे

एहसास -ए -करम हम पर ताउम्र रहे
हमेशा तू यहीं कहीं मेरे आसपास रहे

मंजिल मेरे खुदा तू मुझे नज़र करना
तेरे करम का चर्चा हो गली – गली

इतना रहम हम पर तासहर करना
मुझे तेरे करम का एहसास हो

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