मुसाफ़िर

      ?मुसाफ़िर ?

जिन्दगी  काँटों भरी है चल मुसाफिर चल ।
गिर गिर कर उठ संभल मुसाफ़िर चल ।

लाख तूफाँ आये तुम रूकना नहीं।
मंजिलों की चाह  है झुकना नहीं ।
मंजिल तुझे मिल जायेगी आज नहीं तो कल।

याद रख जो आँधियों से है टकराते ।
मंजिल कदम चूमने उनके ही आते।
गुनगुनाना कर मुस्कुरा कर ऐ मुसाफ़िर चल ।

लक्ष्य अपना ले बना भटक मत
ये माया की नगरी में अटक मत
सुकून मिलता जाएगा चल मुसाफिर चल

जिन्दगी काँटों भरी है चल मुसाफिर चल ।
गिर गिर कर उठ संभल मुसाफ़िर चल ।

केवरा यदु “मीरा “
राजिम (छ,ग)

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