मेरी कविता मां काली है

मेरी कविता में करुण नही,
क्रंदन कर अश्क बहायेगी ।
श्रृंगार नहीं है कविता में ,
जो गीत प्रेम के गायेगी ।
सैनिक के साथ चला करती,
यह भारत की रखवाली है ।
शत्रु का शोणित पान करे ,
मेरी कविता मां काली है ।
प्रलय कर दे शत्रु दल में,
वैरी को त्रास भयंकर है।
जनहित को जो विषपान करे ,
मेरी कविता शिव शंकर है।
धर से मुंडों  को काट काट ,
यह हाहाकार मचाती है ।
शम्भू बन तीजा नयन खोल ,
यह तांडव करती जाती है ।
वंशज दिनकर की  है कविता,
गंगा जमुना यह सिंधु है ।
सब धर्मों का सम्मान करे पर,
अन्तरमन से हिन्दू है ।
भारत पर संकट आये तो ,
अब्दुल हमीद हो जाती है ।
बन भगत सिंह मिट्टी में यह ,
बंदूकें बोती जाती है ।
सैनिक संग बैठ मिराजों में,
जब पी ओ के में जाती है ।
पैंतालिस के बदले में कविता,
तीन सौ नर मुंड गिराती है।
मेरी कविता का शब्द शब्द,
ह्रदय में ठक कर जाता है ।
कविता रघुवर का धनुष बाण,
रत्नाकर भी थर्राता है ।
जो नहीं मिटायें घोर तिमिर ,
वह रबि नहीं हो सकता ।
लेखन तो मेरा ज्वाला है ,
रति छवि नहीं हो सकता है।
बलिदानों में श्रृंगार लिखे,
वह कवि नहीं हो सकता है ।
इसीलिये कविता मेरी यह,
आग लगाने वाली है ।
शत्रु का शोणित पान करे ,
मेरी कविता मां काली है

               रचयिता
       किशनू झा “तूफान”
         8370036068
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