मेला पर दोहे-नवीन कुमार तिवारी(mela par dohe)

*मेला*

मेला देखो घूमके,कितना रहता भीड़ ।

मानस रहते झूमते ,किसका कैसा नीड़ ।।

खुले हाट बाजार में , बेच रहे सामान ।

साज बजे भोंपू सुने , बैठ  कहे श्रीमान ।।


जमघट देखे  भागते ,उड़ने लगे गुबार ।

मीठा खारा खा रहे , मिलता खोया प्यार  ।।


मेला ठेला घूमते , कटता किसका जेब  ।

मोहक नारी मचलती , बजते अब पाजेब ।।


चूड़ी बिंदी देखते , सोचे नारी जात ।

चटपट झूले बैठती, मिलते ही ये सौगात ।।


पूड़ी सब्जी छानते , बनते जो पकवान ।

सट्टा बाजी हो रही ,कर गये सावधान ।।


*नवीन कुमार तिवारी*

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