KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

मैं सत्य मान बैठा(mai satya maan baitha )

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मैं सत्य मान बैठा प्रकाश को ,
पर वह तो रवि से है।
जैसे काव्य की हर पंक्तियां
कवि से है ।
धारा, किनारा कुछ नहीं होता ।
नदी के बिन।
नदी का भी कहां अस्तित्व है?
जल के बिन।
प्राण है तो तन है ।
ठीक वैसे ही,
तन है तो प्राण है ।
भूखंड है तो विचरते जीव।
वायु है तो उड़ते नभचर ।
मानव है तो धर्म है ।
वरना कैसे पनपती जातियां ,
भाषाएं ,रीति-रिवाजें,
खोखली परंपराएं ।
रात है तो दिन है ।
सुख का अहसास गम से है ।
मूल क्या है ?
खुलती नहीं क्यों ?
रहस्यमयी पर्दा।
असहाय,बेबस दे देते
ईश्वर का रूप।
कुछ जिद्दी ऐसे भी हैं
जो थके नहीं ?
तर्क- वितर्क चिंतन से।
खोज रहे हैं राहें ,
अंधेरी गलियों में
सहज व सरल ।
कुछ खोते ,कुछ पाते।
विकास की नींव जमाते।
फिर भी सत्य अभी दूर है ।
जाने कब सफर खत्म हो
और मिल जाए हमें,
सत्य रूपी ईश्वर..
ईश्वर रूपी सत्य…
✍मनीभाई”नवरत्न”