KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

मैं हूँ साक्षी(mai hu sakhyi)

मैं हूँ साक्षी
बन रहे हैं
वक्त के
नए-नए सांचे
ढल रहा है इंसान
इन नए-नए
सांचों में
गुजर रहा है इंसान
परिवर्तन के दौर से
बदल रही हैं
पुरातन परम्पराएं
आमजन की मान्यताएं
सबकी आकांक्षाएं
हो रहे हैं परिवर्तन
सुखद व दुखद
मैं हूँ साक्षी
इन परिवर्तनों का
-विनोद सिल्ला©