KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

“मोहब्बत से इंकार है” पर मुझे भी उससे प्यार है।

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उलझ जाती है मेरी चूड़ी मेरे ही दुपट्टे से

अब बारिश में भीगने का जतन हर बार करती हूं

जानती हूं घिर रही हूं मोहब्बत में मगर मानने से इनकार हर बार करती हूं ।।

की बिंदी अब टेढ़ी-मेढ़ी नहीं सीधे सीध में लगती है

और झुमका भी मुझे परेशान नहीं करता

अब लटो के साथ उसे भी सुलझाया हर बार करती हूं

जानती हूं घिर रही हूं मोहब्बत में मगर मानने से इंकार हर बार करती हूं ।।

हल्का सा दुपट्टा उड़ जाए तो हवाओं से लड़ जाया करती थी

अब उसे उड़ाने की मिन्नतें हवाओं से बार-बार करती हूं

जानती हूं घिर रही हूं मोहब्बत में मगर मानने से इनकार हर बार करती हूं ।।

कि जिस पायल की गूंज शोर लगती थी मुझे

अब उसे पैरों में डाल हौले से चलने की कोशिश हर बार करती हूं

जानती हूं घिर रही हूं मोहब्बत में मगर मानने से इनकार हर बार करती हूं।।

बारिशे जो डराया करती थी मुझे घर से निकलने को

अब उनमें भीगने की ख्वाहिश हर बार करती हूं

जानती हूं घिर रही हूं मोहब्बत मगर मानने से इनकार हर बात करती हूं ।।

बोली तू तूने से आप पे आ रुकी है

कि अब सलीके से बोलने का प्रयास हर बार करती हूं

जानती हूं घिर रही हूं मोहब्बत में मगर मानने से इनकार हर बार करती हूं ।।

कि अब फर्क मुझ में मुझे भी दिखने लगा है

अब खुद से ही बातें हर बार करती हूं

जानती हूं घिर रही हूं मोहब्बत में मगर मानने से इनकार हर बार करती हूं।।

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