KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

ये देश तुझे ,मांग रहा बलिदान (ye desh tujhe maang raha balidaan)

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ये देश तुझे ,मांग रहा बलिदान ।
चीत्कार सुनके जाग जा इंसान ।
भेद भाव बढ़ रहे जन जन में ।
बँट गए हैं बन अमीर फकीर ।
मां ना चाहेगी, बच्चों में ये ,
जानो रे तुम ,मां की पीर ।
भ्रष्टाचार का है बोल बाला
और मजे लूट रहे बेईमान।।
ये देश तुझे ,मांग रहा बलिदान ।
चीत्कार सुनके जाग जा इंसान ।
समझते हैं जो खुद को  सेवक
असलियत में है स्वार्थ की खान ।
अब स्वार्थ छोड़ परमार्थ पर प्यारे
लगा जरा ध्यान ।
एकजुट होकर फिर से पा ले 
भारत मां का सम्मान।
पाई नहीं हमने पूरी आजादी ,
क्या पालन होता अपना संविधान।
दिन भर नेताओं की सांत्वना बस 
क्या बदलेंगे ये अपनी जुबान ।
छुपी रहती विरोध व क्रांति में 
प्रगति खुशहाली और अमन ।
छोड़कर अपनी भेड़चाल तू 
ढूंढ ले सच्चाई का दामन।
दगाबाजों की सभा में ,
सच को करें मतदान ।
तभी बन सकता है 
हमारा भारत महान।।

 मनीभाई ‘नवरत्न’,छत्तीसगढ़,