राख 2

रमेश कुमार सोनी , बसना
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हाइकु  ( राख – 2 )
1
मोक्ष ढूंढने
चला – चली की बेला
राख हो चला ।।

2
राख का डर
जिंदगी ना रुकती
मौत है सखी ।।

3
पानी जिंदगी
अग्नि , राख की सखी
नहीं निभती ।।

4
राख बैठे हैं
भूखे – प्यासे बेचारे
शमशान गाँव ।।

5
राख तौलते
सब राख के भाव
तेरा ना मेरा ।।

6
राख हो जाने
जिंदगी का श्रृंगार
चार दिन का ।।

7
राख में उगे
आशा के दूब हरे
श्रम का भाग्य ।।

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