रोटियाँ- सुलोचना परमार “उत्तरांचली “;(Rotiyaan)

*रोटी *

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पेट की आग बुझाने को
रहती हैं तैयार ये रोटियां।
कितने सहे थे जुल्म कभी
तब मिल पाई  थी रोटियां।

सदियों से ही गरीब के लिए
मुश्किल थीं रोटियां ।
कोड़े मारते थे जमीं दार
तब मिलती थीं रोटियां ।

घरों में करवाई बेगारी
कागजों में लगवाए अंगूठे
तब जाके भीख में कही
मिलती थी रोटियां ।

अपनी आ न ,बान, शान
बचाने को कुछ याद है।?
राणा ने भी खाई थीं यहां
कभी घास की रोटियां ।

इतिहास को टटोलो 
और गौर से देखो  ।
गोरों ने भी हमको कब
प्यार से दी थी ये रोटियां ।

आज भी हैं हर जगह
कुछ किस्मत के ये मारे
जिनके नसीब में खुदा
लिखता नही ये रोटियां।

गोल, तंदूरी, रुमाली कई
तरह की बनती ये रोटियां ।
भूखे की तो अमृत बन 
जाती हैं सूखी ये रोटियां ।

महलों में रहने वालों को
इसका इल्म नही होता।
कभी भूख मिटाने को ही
बेची जाती हैं बेटियां ।

सुलोचना परमार “उत्तरांचली “
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