लक्ष्मण रेखा

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*लक्ष्मण रेखा*
जब भी देखता हूं
उसका चेहरा
उन्माद छा जाता मुझमें
उसमें जो बात है
वो उसकी छायाचित्र में भी
रंच कम नहीं।
उंगलियों से यात्रा करता
उसे पाने को तस्वीर में,
मंजिल तलाशता।
इस राह में पर्वतश्रृंखला है
तो गहरी खाईयां भी।
जिसमें बार-बार चढ़ता
बार-बार गिरता
बिखरता
खुद को बटोरता
उसकी मुस्कान की
टेढ़ी नाव लेकर
नैनों की झील पार करता।
माथे के सितारे से
अंधेरी गलियों से निकलता।
परन्तु उफ़!
ये रक्त-सी लक्ष्मण-रेखा माँग ।
मेरी मनोवृत्ति को
झकझोर दिया।
फिर मैंने गौर किया-
ये वासना थी
जो सदैव बहकाती
रति के वेश में
प्रेम तो बिल्कुल नहीं।
✒️ मनीभाई’नवरत्न’ छत्तीसगढ़

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