वफा का सबूत

*??वफा का सबूत??*

हमनें रातों को पाला
*उजालों* की तरह
दिन में बहस छिड़ गई
*सवालों* की तरह ,

कहने को वो हम पे जान
छिड़कते रहे
मगर दाग देते रहे नये
*छालों* की तरह ,

दावा था उनका , हम तुम
पे मरते हैं
नित बदलते रहे वो ,
*ख्यालों* की तरह ,

कैसे उनकी बातों का हम
*यकीं* कर लेते
*नोट* पूजे जाते हो जहां
*शिवालों* की तरह ,

उनकी जुदाई ने हमें
*तनहा* कर दिया
छलकते , हम भी थे कभी
*प्यालों* की तरह ,

जरूरत क्या थी दिल को
*तोलने-टटोलने* की
हमारा दिल है *नरम* आज भी
उनके *गालों* की तरह

नाहक अपनी *वफा का सबूत*
क्यों मैं देता
हमने चाहा उनको *राकेश*
*दिलवालों* की तरह..✒
*??राकेश कुमार मिश्रा??*

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