KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

वरिष्ठता – मनीभाई

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वरिष्ठता – मनीभाई

वैसे तो लगता है
सब कल की बातें हो,
मैं अभी कहां बड़ा हुआ?
पर जो अपने बच्चे ही,
कांधे से कांधे मिलाने लगे।
आभास हुआ
अपने विश्रांति का।
उनकी मासुमियत,
तोतली बातें
सियानी हो चुकी है।
वो कब
मेरे हाथ से
उंगली छुड़ाकर
आगे बढ़ चले
पता ही नहीं चला।
मैं उन संग
रहना चाहता हूं,
खिलखिलाना चाहता हूं।
पर क्यों ?
वो मुझे शामिल नहीं करते
अपने मंडली में।
जब भी भेंट होती उनसे,
बाधक बन जाता,
उनकी मस्ती में।
शांति पसर जाती
मेरे होने से
जैसे हूं कोई भयानक।
अहसास दिलाते वो मुझे
मेरे वरिष्ठता का।
मैं चाहता हूं स्वच्छंदता
पर मेरे सिखाए गए उनको
अनुशासन के पाठ
छीन लिया है
हमारे बीच की सहजता।
मैंने स्वयं निर्मित किये हैं
जाने-अनजाने में
ये दूरियां।
संभवतः ढला सकूं
अपना सूरज।
और विदा ले सकूं
सारे मोहपाश तोड़ के।
जिससे उन्हें भी मिलें,
अपना प्रकाश फैलाने का अवसर।


✒️ मनीभाई’नवरत्न’,छत्तीसगढ़

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