शहादत का इबादत कार,भी बे पीर होता है(sahadat ka ibadat kar bhi be pir hota hai)

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शहादत का इबादत कार,भी बे पीर होता है।
दिलो मे गर्व भर जाए,नयन से नीर खोता है।
वतन का मान रखते हैं,मरण ईमान हैं रखते।
जगे जब वीर सीमा पे, मजे से मीर सोता है।
तजे परिवार ये प्यारे,सितारे रोज है गिनता।
जनाजे हर शहीदी पर, मशाने धीर गोता है।
नहीं डरते शहीदी से, शमन आतंक के करने।
शहीदी मान के खातिर,मरण जागीर बोता है।
मुझे मन हूक उठती है,तिरंगे मान चाहत की।
मिला ना ये मुझे मौका, कहे बलबीर रोता है।
शहीदों की शहादत से,यही पैगाम है मिलता।
मरें तो देश के खातिर,वृथा शमशीर ढोता है।
करेंगे होंश की बातें,दिलों में जोश जग जाएँ।
लिखेंगे जोश भरना है, वही तो चीर धोता है।
लिखें भूषण तरीके में,जगादे आग सूरज सी।
बहे जन के पसीने में, वतन तकदीर स्रोता है।
जगादे जोश तन मन में,लगादे आग सीनें में।
शहीदी मान को जिंदा,सलामतगीर जोता है।
चलाओ लेखनी ऐसे,इसे तलवार कर लेना।
लिखे शर्मा सलीके से,शहीदी तीर न्यौता है।
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✍©
बाबू लाल शर्मा “बौहरा”
सिकंदरा,303326
दौसा,राजस्थान,9782924479

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