शहादत

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.   *शहादत* 
.      (१४ ,१४ मात्रिक)
शहादत की इबादत का,
यही दस्तूर होता है।
दिलो मे गर्व भर जाए,
नयन में नीर होता है।
मुल्क का मान रखते हैं,
मौत ईमान रखते हैं।
जगे जब वीर सीमा पे,
चैन से देश सोता है।
छोड़ परिवार सब प्यारे,
सितारे गगन गिनता है।
तभी तो हर शहादत पे,
किसी का चाँद खोता है।
नमन करते शहादत को,
शमन आतंक करते है।
शहीदी मान के खातिर,
शरीरी तान बोता है।
मुझे मन हूक उठती है,
तिरंगे कफन चाहत की।
मिला ना क्यों मुझे अवसर,
सोच के *लाल* रोता है।
शहीदों की शहादत से,
यही पैगाम है मिलता।
मरें तो देश के खातिर,
जनम क्यों व्यर्थ ढोता है।
करें अब होंश की बातें,
दिलों में जोश जग जाएँ।
का्व्य जो जोश भरता है,
जोश ही शोक धोता है।
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✍©
बाबू लाल शर्मा “बौहरा”
सिकंदरा,303326
दौसा,राजस्थान,9782924479
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