श्रीमद्भगवद्गीता दोहे

श्रीमद्भगवद्गीता
       दोहे
||1||
अर्जुन रथ की डोर को,थामे श्री भगवान।
कुरुक्षेत्र के समर में,दीन्हा दुर्लभ ज्ञान ||
||2||
खड़े बंधु सब सामने , गुरू पितामह आय।
वध इनका कैसे करूँ, माधव देहु बताय।।
||3|| 
मोहग्रस्त अर्जुन हुआ, छोड़ शौर्य अभिमान।
भिक्षायापन मैं करूँ नहीं चलाऊँ बाण।।
||4||
मोह निवारा पार्थ का,लेकर के संज्ञान।
कृष्ण चंद्र ने दे दिया, गीता दुर्लभ ज्ञान।।
||5||
मैं और मेरा कुछ नहीं, दिखता जो संसार।
एक तत्व सबमें बसे ,  सब उसका  विस्तार।।
||6||
आत्म तत्व मिटता नहीं,क्षणभंगुर है देह।  
अविनाशी का अंश है,नहीं बनाये गेह।।
||7||
कर्म करो सब धर्महित,मिटे सभी संताप
फल की ईच्छा मत करो,नहीं लगेगा पाप।।
||8||
धर्म हानि जब भी हुए, लेता मैं अवतार।
दुष्ट जनों का नाश कर,  लेऊँ  संत उबार।।
||9||
जीत भोगते राज्य को, मरे स्वर्ग को जाय।
अर्जुन दोनों ही जगह, युद्ध बना पर्याय।।
  ||10||
ज्ञान,भक्ति अरु कर्म का , दे अद्भुत संदेश।
मोह निवारा पार्थ का, दे गीता उपदेश।।
पुष्पाशर्मा”कुसुम”
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