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संघर्ष और सुरक्षा

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संघर्ष और सुरक्षा
(रचयिता:- मनीभाई’नवरत्न’)



दो नन्हें नन्हें पौधे, पास-पास में थे उगे।
एक दूजे के सुख-दुख में ,सदा से  लगे।
एक दिन आई जंगल में भीषण आंधी।
चंद वृक्ष ही बच पाये, उखड़ गए बाकी।
दोनों पौधों को अबसे ,होने लगा था डर।
यहीं जमें रहे तो एकदिन,जायेंगे बिखर।
एक  बोला -“नियति पर अपना वश नहीं।
मेहनत से जड़ें मजबूत करें, यही है सही।”
दूसरा पौधा यह सुनके जोर जोर से हंसा ।
उसको अपने शक्ति पर, नहीं था भरोसा ।
बोला-“बेहतर होगा, ढूंढले सुरक्षित स्थान ।
बड़े वृक्ष के बीच रहे तो, बची रहेगी जान।”
पहला बोला- “मैं करूंगा सच  का सामना ।
सुरक्षा में जीने से श्रेष्ठ ,संघर्ष में मर जाना।”
मतभेद हो जाने से, टूट गई उनकी मित्रता।
एक घने वन के बीच, दूजा खुला में रहता ।
खुली हवा में सहता, वह रोज हवा थपेड़े ।
होती बारिश बौंछारें और तेज सूर्य किरणें ।
पर हार न माना , करता रोज ऊर्जासंचार ।
जीवन में  चुनौती, कर चुका था स्वीकार ।
जीत लेकर आती ,जीवन में हरेक चुनौतियां।आत्मविश्वास बढ़ाये,और आंतरिक शक्तियां।
विकासयात्रा में पौधा,एक दिन वृक्ष बन गया ।
उसी जगह में मजबूत होके ,अडिग तन गया ।
दूजे पौधे को मिली, माना जंगल की सुरक्षा ।
हवा तेज धूप न पाये, रह गया बीमार बच्चा ।
कहीं हम तो नहीं चाहते,ऐसी सुरक्षा घेराव ।
बिना संघर्ष किये हो जाये, खुद का बचाव।
मानव जीवन को होना पड़ेगा संघर्ष प्रधान।
वरना रह जायेंगे , अपने शक्ति से अनजान।
सुरक्षा की खोज, हमें बना देती है कमजोर।
सब आसान हो जाएगा, जब लगायेंगे जोर।
✒️ मनीभाई’नवरत्न’, बसना महासमुंद छग