साधु (कुण्डलिया छंद)-बाबूलालशर्मा (sadhu -babaulal sharma)

   *साधु*    
ऐसे सच्चे  साधु जन, जैसे सूप स्वभाव।
यह तो बीती  बात है, शेष बचा पहनाव।
शेष बचा पहनाव,तिलक छापे ही खाली।
जियें विलासी ठाठ, सुनें तो बात निराली।
कहे  *लाल*  कविराय, जुटाते  भारी पैसे। 
सुरा  सुन्दरी  शान, बने   स्वादू अब ऐसे।
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टोले  साधु  सनेह जन, चेले   चेली  संग।
कार गाड़ियाँ काफिला, सुरा सुन्दरी भंग।
सुरा  सुन्दरी  भंग, विलासी भाव अनोखे।
दौलत  के  हैं  दास, ज्ञान  ये  बाँटे  चोखे।
बुरे कर्म तन *लाल*, धर्म धन के बम गोले।
नाम  कथा  सत्संग, माल ठगते  ये टोले।
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बाबू लाल शर्मा, बौहरा
सिकंदरा,दौसा,राजस्थान
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