KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

सुकमोती चौहान द्वारा रचित बेटी पर दोहे (beti par dohe )

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१.
बेटी होती लाड़ली,जैसे पुष्पित बाग।
बिन बेटी के घर लगे, रंग चंग बिन फाग।।
२.
बेटी लक्ष्मी गेह की,अब तो नर लो मान।
सेवा कर माँ बाप की,बनती कुल की शान।।
३.
साक्षर होगी बेटियाँ,उन्नत होगा देश
भर संस्कार समाज में,बदलेंगी परिवेश।।
४.
बहु भी बेटी होत है,रखो न दूजा भाव
निज बेटी सा मान दो,लाओ जी बदलाव।।
५.
बेटी के उपकार का, मानो जी आभार
बेटी से संसार है,बेटी से परिवार।।
✍ सुकमोती चौहान रुचि
बिछिया,महासमुन्द,छ.ग.
@कॉपीराइट
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