KAVITA BAHAR
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सुना रहा हूँ तुम्हें भैरवी

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सुना रहा हूँ तुम्हें भैरवी


सुना रहा हूँ तुम्हें भैरवी जागो मेरे सोने वाले!
जब सारी दुनिया सोती थी तब तुमने ही उसे जगाया
दिव्य गान के दीप जलाकर तुमने ही तम दूर भगाया,
तुम्हीं सो रहे, दुनिया जगती यह कैसा मद है मतवाले।


गंगा-यमुना के कूलों पर, सप्त सौध थे खड़े तुम्हारे,
सिंहासन था, स्वर्ण छत्र था, कौन ले गया हर वे सारे?
टूटी झोंपड़ियों में अब तो जीने के पड़ रहे कसाले!


भूल गये क्या रामराज्य वह जहाँ सभी का सुख था अपना,
वे धन धान्य पूर्ण गृह अपने आज बना भोजन भी सपना,
कहाँ खो गये वे दिन अपने किसने तोड़े घर के ताले?


भूल गये वृन्दावन मथुरा भूल गए क्या दिल्ली झाँसी?
भूल गए उज्जैन अवन्ती भूले सभी अयोध्या काशी?
यह विस्मृति की मदिरा तुमने कब पी ली मेरे मतवाले!


भूल गये क्या कुरुक्षेत्र वह जहां कृष्ण की गूंजी गीता
जहाँ न्याय के लिए अचल हो, पांडु-पुत्र ने रण को जीता,
फिर कैसे तुम भीरु बने हो तुमने रण-प्रण के व्रत पाले!


याद करो अपने गौरव को थे तुम कौन, कौन हो अब तुम
राजा से बन गए भिखारी, फिर भी मन में तुम्हें नहीं गम
पहचानो फिर से अपने को, मेरे भूखों मरने वाले।


जागो हे पांचाल निवासी! जागो हे गुर्जर मद्रासी!
जागो हिन्दू मुगल मरहठे, जागो मेरे भारतवासी!
जननी की जंजीरें बजती, जगा रहे कड़ियों के छाले।
सुना रहा हूँ तुम्हें..

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