सेदोका की सुगन्ध-पद्म मुख पंडा स्वार्थी(sedoka ki sugandh)

सत्यवादी जो
परेशान रहता
अग्नि परीक्षा देता
पूरी दुनिया
उसे हंसी उड़ाती
वो चूं नहीं करता
अंधा आदमी
मन्दिर चला जाता
खुद को समझाता
उसे देखने
जो दिखता ही नहीं
आंखों के होते हुए
उसके घर
देर भी है सर्वदा
अंधेर भी है सदा
न्याय से परे
मिलता परिणाम
खास हो या कि आम
जो करते हैं
अथक परिश्रम
क्या थकते नहीं हैं?
सच तो यह
कि बिना थके कभी
काम ही नहीं होता!!
अनवरत
जीवन  रथ चले
सुबह सांझ ढले
मज़ाक नहीं
कि परिवार पले
बिना आह निकले
मेरी कुटिया
मुझे आराम देती
मेरी खबर लेती
बिजली नहीं
तो भी प्रकाश देती
ठंडक बरसाती

पद्म मुख पंडा स्वार्थी

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