स्मृतियाँ और राधा (smiritiyan aur radha)

रतजगे हैं हमने कई किये…
प्रतीक्षा में तुम्हारी हे प्राणप्रिये !
प्रति स्पन्दन संग नाम तुम्हारा
हम राधे-राधे जपा किये ।।१।।
वो यमुना-तट का तरु-तमाल
था विरह-स्वर में देता ताल
स्मृति संग लय भी बंधती रही
मम छंदों की अनुमति लिये ।।२।।
कभी सांसें हमारी, कभी बांसुरी…
प्रतीक्षारत् सदा से नयन-पांखुरी
स्मृतियाँ क्षण-क्षण रुलातीं-हँसातीं
तुम्हें कैसे बतायें ? हैं कैसे जीये ? ।।३।।
न चाँदनी ही बिछी थी मधुवन में कहीं
तुम्हारे मुख से जो पूनम धुली थी नहीं
मुरली भी कर्कश स्वरों से थी बोझिल
तान नुपुरों की सुन, माधुरी को पीये ।।४।।
प्रातः शरद की हल्की तपन तुम
पावस की ठण्डी फुहारी पवन तुम
मैं तुम बिन अधूरा सदा से हे पूर्णा !
सुख-स्वर्णिम मथुरा न भाये हिये ।।५।।
रम्ये ! तुम्हारी प्रथम मृदुल-छुअन से
मधुवन सम लागे मथुरा भी छन से
पुष्पावली शोभित पुर की विभा भी
है मुख पर निशा की तड़पन लिये ।।६।।
स्मृतियाँ ही सार्थक सुख-साधन सदा से
हैं नैनों में संजोये हम अश्रु-धन सदा से
उन स्मृतियों का ही तो सहारा है राधे !
अब कण-कण में तुम ही तुम हो प्रिये ! ।।७।।
 निमाई प्रधान ‘क्षितिज’*
          रायगढ़,छत्तीसगढ़
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