स्वतंत्र हो चलें

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स्वतंत्र हो चलें
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हर जगह रूप है ,
एक उसी का।
जिसे लोग अल्लाह-ईश्वर कहते हैं।
फिर क्यों लोगों ने…?
हमको ये कहा
अल्लाह मस्जिद में,
ईश्वर मंदिर में रहते हैं।
हमने समेट लिया खुद को
अपनी अपनी खुदा को समेट कर
गिरवी रख दी वजूद को
अपना विवेक खो कर।
आखिर हमें
किस बात का डर?
ये दूरियां हममें
क्यों कर गई घर?
मन में  समत्व भर
अब तो स्वतंत्र हो चलें
धर्म के नाम पर।
✒️ मनीभाई’नवरत्न’छत्तीसगढ़

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