स्वयंसिद्धा(swayamsiddha)

स्वयंसिद्धा
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देहरी को लाँघने ,
साहस सदा तुममें रहा,
अधिकार के सत्कार में
कर्तव्य की कारा बना,
क्यूँ  प्रश्न वाचक तुम बनी,
अवधारणा को तोड़
खोल पाँखे खोल
है तू सदा से ही ,
जगतनियन्ता ने बनाया
सृष्टि के आदि से,
पुराण, वेद, उपनिषद्
कालातीत से कालांतर
गढ़ा है ,सुझाया,
जन्म जन्मातर से हो
देवी तुम,
स्वयंसिद्धा।
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डॉ मीता अग्रवाल रायपुर छत्तीसगढ़
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