हसरतों को गले से लगाते रहे(hasarato ko gale se lagate rahe)

दिनाँक – १०/०३/१९
दिन     – रविवार
विधा   – ग़ज़ल
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हसरतों को गले से लगाते रहे,
थोड़ा थोड़ा सही पास आते रहे..
आप की बेबसी का पता है हमें,
चुप रहे पर बहुत *ज़ख़्म* खाते रहे..
इस ज़माने का दस्तूर सदियों से है,
बेवजह लोग *ऊँगली* उठाते रहे..
मेरी दीवानगी मेरी पहचान थी,
आग अपने ही इसमें लगाते रहे..
*इश्क़* करना भी अब तो *गुनह* हो गया,
हम गुनहगार बन सर *झुकाते* रहे..
तुमको जब से बनाया *है* अपना सनम,
बैरी दुनिया से खुद को छुपाते रहे..
इश्क़ की अश्क़ सदियों से पहचान है,
तेरी आँखों के आँसू चुराते रहे..
तुमको *यूँ* ही नहीं जान कहते हैं हम,
जान ओ दिल *सिर्फ़* तुमपे लुटाते रहे..
*ख़्वाब* मेरे अधूरे रहे थे मगर,
हम तो आशा का दीपक जलाते रहे..
है *ख़ुदा* की इनायत, है फ़ज़लो करम,
अब *क़दम* दर *क़दम* वो मिलाते रहे..
हम भी चाहत में उनके दिवाने हुए,
वो भी ‘चाहत’ में हमको लुभाते रहे..
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नेहा चाचरा बहल ‘चाहत’
झाँसी
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