हिन्दी बिन्दी भूल गये सब( hindi bindi bhul gye sab)

बड़े बड़े हैं छंद लिखैया,
          सूनी किन्तु छंद चटसार|
हिन्दी बिन्दी भूल गये सब,
          हिन्दी हिन्दी चीख पुकार||
है हैं का ही अन्तर भूले,
      बिना गली खिचड़ी की दाल|
तू तू में में मची हुई है,
        नोंचत बैठ बाल की खाल||
शीश पकड़ कर बैठ गये हैं,
        सुर लय यति गति चिह्न विराम|
एक पंक्ति सुरसा-सी लम्बी,
       एक पंक्ति की तंग लगाम||
छाँट भाव की सभी टहनियाँ ,
      ठूँठ शब्द से माँगत छाँव|
कोयल की ज्यों छोड़ सभा को,
      पाते काक सभा की काँव||
ग़ज़ल आज क्यों सिर पर बैठी,
       कर लो थोड़ा सोच विचार |
छंद सनातन शास्त्र बताते,
       क्यों नहिं होती फिर गुंजार||
तुलसी मीरा केशव भूषण,
        दिनकर कबिरा सूर महान||
अभी समय है छंद ज्योति का,
        हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान||

दिलीप कुमार पाठक “सरस”न

बड़े बड़े हैं छंद लिखैया,
          सूनी किन्तु छंद चटसार|
हिन्दी बिन्दी भूल गये सब,
          हिन्दी हिन्दी चीख पुकार||
है हैं का ही अन्तर भूले,
      बिना गली खिचड़ी की दाल|
तू तू में में मची हुई है,
        नोंचत बैठ बाल की खाल||
शीश पकड़ कर बैठ गये हैं,
        सुर लय यति गति चिह्न विराम|
एक पंक्ति सुरसा-सी लम्बी,
       एक पंक्ति की तंग लगाम||
छाँट भाव की सभी टहनियाँ ,
      ठूँठ शब्द से माँगत छाँव|
कोयल की ज्यों छोड़ सभा को,
      पाते काक सभा की काँव||
ग़ज़ल आज क्यों सिर पर बैठी,
       कर लो थोड़ा सोच विचार |
छंद सनातन शास्त्र बताते,
       क्यों नहिं होती फिर गुंजार||
तुलसी मीरा केशव भूषण,
        दिनकर कबिरा सूर महान||
अभी समय है छंद ज्योति का,
        हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान||

दिलीप कुमार पाठक “सरस”श
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बड़े बड़े हैं छंद लिखैया,
          सूनी किन्तु छंद चटसार|
हिन्दी बिन्दी भूल गये सब,
          हिन्दी हिन्दी चीख पुकार||
है हैं का ही अन्तर भूले,
      बिना गली खिचड़ी की दाल|
तू तू में में मची हुई है,
        नोंचत बैठ बाल की खाल||
शीश पकड़ कर बैठ गये हैं,
        सुर लय यति गति चिह्न विराम|
एक पंक्ति सुरसा-सी लम्बी,
       एक पंक्ति की तंग लगाम||
छाँट भाव की सभी टहनियाँ ,
      ठूँठ शब्द से माँगत छाँव|
कोयल की ज्यों छोड़ सभा को,
      पाते काक सभा की काँव||
ग़ज़ल आज क्यों सिर पर बैठी,
       कर लो थोड़ा सोच विचार |
छंद सनातन शास्त्र बताते,
       क्यों नहिं होती फिर गुंजार||
तुलसी मीरा केशव भूषण,
        दिनकर कबिरा सूर महान||
अभी समय है छंद ज्योति का,
        हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान||
(वीर छंद*
विधान~31 मात्रा, 16,15 पर यति|
चरणान्त में वाचिक भार 21,
कुल चार चरण, क्रमागत दो दो समतुकान्त)

दिलीप कुमार पाठक “सरस”
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