KAVITA BAHAR
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हे! प्रकृति मातृ नमन तुम्हें (hey! Prakriti matri naman tumhe)



हे! प्रकृति मातृ नमन तुम्हें
रचना-  पुखराज यादव “पुक्खू”
हे! जगत जननी,
             हे! भू वर्णी….
हे! आदि-अनंत,
            हे! जीव धर्णी।
*हे! प्रकृति मातृ नमन तुम्हें*
हे! थलाकृति…हे! जलाकृति,
हे! पाताल करणी,हे! नभ गढ़णी।
हे! विशाल पर्वत,हे! हिमाकरणी,
हे! मातृ जीव प्रवाह वायु भरणी।
*हे! प्रकृति मातृ नमन तुम्हे*
तू धानी है,वरदानी है..
तुझे ही जुड़े सब प्राणी है।
तू वर्षा है,तू ग्रीष्म…है
और तू शीतल शीत है…..!
तू ही माँ प्राण-दायनी है।
*हे ! प्रकृति मातृ नमन तुम्हे*
तू ज्वाल है, तू उबाल है…
समंदर की लहरों का उछाल है।
तू हरितमा,तू स्वेतमा…
तू शांत है, तू ही भूचाल है…!
हे! उर्वरा, हे! सरगम स्वरा,
झरने की झर-झर..
हिम के स्वेत रंग निर्झर..
मुक्त पवन की सर-सर।
*हे ! प्रकृति मातृ नमन तुम्हे*
हे! खेत खलिहान,मरूथल,
हे! रेतिली रेंगिस्थान……!
हे! पंक तू, हे! उत्थान तू…
नित करती माँ नव निर्माण..!
हे! महाद्वीप, हे!न्युन शिप,
है पहान तू, है निशान तू ।
हे! पृथ्वी,हे! प्रकृति,हे! शील,
परमाणु की पहचान तू।
*हे ! प्रकृति मातृ नमन तुम्हे*
नमन करता आपको..यादव,
हे! देवी तुम ही मेरा आधार…हो।
जीवन में,हर स्पर्श में, स्वांस में,
पुक्कू कहता सब तुम ही सार..हो।
*हे प्रकृति मातृ नमन तुम्हे*
               रचना-
   *_पुखराज यादव”पुक्कू”*
          9977330179