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है कितना अनोखा ये समाज(hai kitna anokha ye samaj)

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है कितना अनोखा ये समाज।
है रंगबाज ,है जंगबाज।

इसकी अटूट करतूतें
मन छूलें कभी दहले
जिंदगी अगर प्यारी
सब को शांत सह ले।।
समझ ले संघ को आज।
मानले रीति रिवाज।
है कितना अनोखा ये समाज।
है रंगबाज है जंगबाज।

हर बात है अग्नि रेखा ,
स्वीकार ले जो तू ना देखा ।
तू भी इस कूल का अंग ,
दामन ना अलग हो पाए इसके संग ।
बीते तेरी हर काज ,
तू सहनशील तुझ पर नाज ।
है कितना अनोखा ये समाज ।
है रंगबाज है जंगबाज ।

मिले ना शांति कर तू क्रांति ।
चौका कर सभी को दिला दे भ्रांति।
आज सब की यही सिद्धांत
दिन सेवक तो रात दे मात।
देख ली आज सबकी मिजाज।
जितना वाचाल है उतना राज।
है कितना अनोखा ये समाज ।
है रंगबाज है जंगबाज ।

नायक बने हो चाहे खलनायक
इस गद्दी का क्या तू नहीं लायक?
छोड़ दे तू अपनी नमाज
पकड़ ले तू कानूनी किताब।
फिर देख आगे तेरा समाज।
बन जाएगा सबसे लाजवाब।
है कितना अनोखा ये समाज।
है रंगबाज है जंगबाज।।

मनीभाई ‘नवरत्न’,