होली है बेरंग(holi hai berang)

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*होली*
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सभी रंग मिलावट के,
होली है बेरंग!
नहीं नेह की पिचकारी
नहींभीगता  अंग!
भय,शोक,चिंता तनाव,
प्रीत,प्रेम नहीं सद्भाव,
रिश्तों की डोरी टूटी
जैसे कटी पतंग!
होली है…………
टेसू और पलाश सिसकते,
खुशबू को अब फूल तरसते,
पेड़ों पर डाली के पत्ते
गुम है पतझड़ संग
होली है बेरंग…
कागा करता काँव-काँव,
आम्रकुंज की उजड़ी छाँव,
फिर कोयल की हूक से,
क्यों होते हम दंग!
होली है बेरंग……
पकवानों के थाल नहीं,
ढोल,मांदर, झाल नहीं,
चरस,गाँजे और शराब में,
फीकी पड़ गयी भंग!
होली है बेरंग…
—डॉ.पुष्पा सिंह ‘प्रेरणा’
अम्बिकापुर(छ. ग.)

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