ज़ख्म भी गहरे भरे हैं

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 *पुलवामा शहीदों को समर्पित कविता*
*ज़ख्म भी गहरे भरे हैं*

छोड़ चले प्यारे वतन को ,मेरे वीर जवान है
ज़ख्म भी गहरे भरे है,दिखते अब निशान है।
ऐसे धोखे बार बार हम , अकसर खाते रहे हैं
भारत माँ की आँखों से,आंसू भी आते रहे हैं
बिखर गए टुकड़े होकर,ऐसा क्यों बलिदान है
ज़ख्म भी गहरे भरे हैं, दिखते अब निशान है।
सुनके क्या गुजरी है,मुँह का निवाला छूट गया
जिनके भी कश्मीर में थे, उनका दिल टूट गया
आज खबर मैं देखूं कैसे,उनमें अपनी जान है
ज़ख्म भी गहरे भरे हैं, दिखते अब निशान है।
एक -एक कतरे पर ,भारत माँ का नाम लिखा
ओढ़ तिरंगा आये जब,सब देशों में मान दिखा
अंतिम सांस बचे  तो बोेले ‘मेरा देश महान है’
ज़ख्म भी  गहरे भरे हैं , दिखते अब निशान है
चीख निकल गयी माँ की, मूर्छित हो गई बेटी
तोड़ चूड़ियां दहाड़ मार,पत्नी धरती पर लेटी
सदमें में परिवार,फिर भी जिन्दा वो हैवान है
ज़ख्म भी गहरे भरे हैं, दिखते अब निशान हैं।
मुर्दा बनकर तूआतंकी,किस बिल में सोया है
मेरे वतन का कोना-कोना,गला फाड़ रोया है
ढूंढ-ढूंढ मारेगे तुमको,जब तक तन में प्रान है
ज़ख्म भी गहरे भरे हैं , दिखते अब निशान है।
✍–धर्मेन्द्र कुमार सैनी,बांदीकुई
दौसा(राज.)
मो.-9680044509

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