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30 अक्टूबर विश्व बचत दिवस : पैसों की महत्व पर हिंदी कविता

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यहाँ पर 30 अक्टूबर विश्व बचत दिवस पर हिंदी कविता दी जा रही है आपको कौन सी कविता अच्छी लगी कमेंट करके बताएं

30 अक्टूबर विश्व बचत दिवस : पैसों की महत्व पर हिंदी कविता

30 अक्टूबर विश्व बचत दिवस 30 October - World Savings Day
30 अक्टूबर विश्व बचत दिवस 30 October – World Savings Day

पैसों की बचत पर बेहतरीन दोहे

पढ़ लिख कर हम योग्य बन, करें कमाई नेक,

अपनों से ऊपर उठ सोचें,परहित धर्म अनेक। 1।
जितनी होती दक्षता, उतना मिलता लाभ,
नहीं मिले अतिरिक्त कुछ, मीत सुनो तुम साफ। 2।
अपनी आय विचार के, खर्च करो श्रीमान,
रहो सुखी परिवार संग, रहे बचत का ध्यान। 3।
बूॅद- बूॅद से घट भरे, अक्षर- अक्षर ज्ञान,
थोड़ा- थोड़ा बचत कर, तुम भी बनो महान। 4।
आज बचत जो कर लिया, कल आयेगा काम,
कौन जानता वक्त को, करे सुबह को शाम। 5।
सोच-समझ, व्यवहार में, नहीं अपव्यय होय,
पैसों के ही बचत से, सुख-दुःख अनुभव होय। 6।
पैसों की ही बचत से, तन-मन स्वस्थ प्रसन्न,
अपने संग ही देश का, रहे कोष सम्पन्न। 7।

रचयिता:-
हरिश्चंद्र त्रिपाठी ‘हरीश ‘
ई-8,मलिक मऊ नई कालोनी, रायबरेली

मितव्ययता का महत्व बताती वर्षा जैन “प्रखर” की यह शानदार कविता

खुशियाँ मोहताज नहीं पैसों की
यह तो सत्य है मेरे भाई। 
फिर भी मुस्कान नहीं होठों पर
जब तक हाथ में ना हो पाई। 

फिजूलखर्ची से बचो ही हरदम
खर्च करो तुम सोच समझकर। 
आमदनी अठन्नी खर्चा रुपैया
ऐसा कभी ना करना भैया। 

दो पैसों की बचत ही हरदम
काम आएगी आगे चलकर। 
हरदम बचे रहो कर्जे से
सुखमय जीवन बीते मजे से। 

अपने बच्चों को भविष्य दो
पंख सुनहरे सपनों के दो। 
बाट जोहती उनकी आँखें
प्रश्न वाचक ना बनके टपके। 

जितनी हो तुम में क्षमता
उतनी ही तुम रखना समता। 
देख दूसरों की बढ़ती को
किश्त में ना तुम बढ़ना भैया। 

नकदी देकर खुशियाँ लो
उधार में ना तुम पैसा लो। 
एक-एक बूँद से भरता गागर
नदियाँ मिलती बनता सागर। 

सोच-समझ कर खर्चो पैसे
ताकि आगे भविष्य ना तरसे। 
बात पते की आज जान लो
मितव्ययता है सार जान लो।

वर्षा जैन “प्रखर”
दुर्ग (छत्तीसगढ़)

पैसों की उपयोगिता बताती हुई रजनी श्री की कविता

पैसों का जब पेड़ नही तो
पैसे क्योँ लुटाए हम,
क्योँ न जितनी चादर हो,
उतने पैर पसारे हम।

पैसे बनते है कागज़ से,
ये तो सबका भ्रम है रहा।
इसके बनने में तो देखो,
कितना परिश्रम,पसीना बहा।

सुबह ,शाम, तपती दुपहरी, 
के रंगों से बनते रुपये।
खर्च करो इसे सोच समझ कर,
इसमे कइयों के सपने दबे।

कभी पिता के रफू कपड़ों की,
बचत ने तुमको कुछ नया दिया।
कभी बचत कर काट अंधेरा,
त्योहार तुम्हारा रोशन किया।

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बचत जरूरी अन्न, पैसों की,
वक़्त आड़े ये काम करें।
 कर के बचत हो राज सदा ,
और बुढ़ापे में आराम करें।

रजनी श्री बेदी
जयपुर

पैसों की बचत के महत्व पर कुमार जितेन्द्र की कविता

पैसों की बचत के,
महत्व को समझाना
मनुष्य के अनमोल,
जीवन को बचाना

रोजगार के अवसरों की, कम होती संख्या
तीव्रता से बढ़ रही है, बेरोजगारों की संख्या
 आज युवा बन रहे हैं, नशीले पदार्थों के ग्राही
 बिन पैसे कैसे होगी, युवाओं की सुनहरी राही

पैसों की बचत के, म
हत्व को समझाना
मनुष्य के अनमोल,
जीवन को बचाना

 आधुनिकता के चकाचौंध में, बढ़ गई महंगाई
 बिन पैसों के कैसे बजाएँ, बिटिया की शहनाई
 तुलनात्मक के दौर में, पैसों पर नियंत्रण करना
 प्रतिस्पर्धा की भावना को, त्याग करना सिखाना

 पैसों की बचत के,
महत्व को समझाना
मनुष्य के अनमोल,
जीवन को बचाना

 ब्याज की छाया में, कहीं भूल न जाएं मूलधन
 निन्यानवे के फेरों में, हम कहां ढूंढेंगे मिश्रधन
 वर्तमान में पैसों की, बचत बन गई चुनौती
 नियंत्रण के अभाव में, लग न जाए पनौती

पैसों की बचत के,
महत्व को समझाना
मनुष्य के अनमोल,
जीवन को बचाना
 

कुमार जितेन्द्र
(कवि, लेखक, विश्लेषक, वरिष्ठ अध्यापक – गणित) 
साईं निवास मोकलसर, तहसील – सिवाना, 
जिला – बाड़मेर, राजस्थान l 
मोबाइल न. 9784853785

पैसों की बचत :विजिया गुप्ता समिधा की बेहतरीन कविता

पैसे की है बचत जरूरी,
सुन लो सब यह बात।
पहले थी जो,भाग व्यवस्था,
वह इसका प्रतिसाद।

एक रुपये यदि,अपनी कमाई,
चार भाग हो जाते थे।
पहला बुजुर्ग,दूजा दान,
तीसरा हिस्सा था वर्तमान,
चौथा हिस्सा रखो सम्भाल,
उसे भविष्य की अमानत जान।

आज समय है,क्रेडिट कार्ड का,
कर्जे में हर इक इंसान।
फाइनेंस करा के मजे करे,
और बघारे,झूठी शान।

एक दूजे की देखा देखी,
भेड़ चाल सब चलते हैं।
किस्तों में उधार की
खुशियाँ पाकर,
खूब दिखावा करते हैं।

आमदनी अठन्नी,खर्चा रुपइया,
ये भी एक कहावत है।
ऐसा कभी ना करना भैया,
वरना बड़ी फ़जीहत है।

एक कहावत सुन लो भईया,
अल्प बचत का है पर्याय।
बूँद-बूँद जब जमा करो तो,
मटका पूरा भरता जाए।

एक-एक जब ईंट जुड़े तो,
घर पूरा बन जाता है।
एक-एक सिक्का डालो तो,
गुल्लक पूरा भर जाता है।

मितव्ययता कंजूसी नही,
समझ लो सब ये बात।
जितनी लम्बी चादर हो,
उतना ही फैलाओ  पाँव।

सोच समझ कर खर्च करें,
और कर्जे से बचे रहें।
अपना भविष्य सुरक्षित रखें,
बच्चों को भी यही कहें।
–———

विजिया गुप्ता “समिधा”
दुर्ग-छत्तीसगढ़

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