KAVITA BAHAR
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आज का नेता पर कविता

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आज का नेता पर कविता

जहाँ बहरी सियासत है, जहाँ कानून है अंधा।
करें किसपे भरोसा तब, जहाँ पे झूठ है धँधा।
विचारों पे लगा पहरा,बड़ा ये ज़ख्म है गहरा,
भला क्या देश का होगा,सियासी रंग है गन्दा।।

मुनाफ़े का बड़ा धंधा, कभी होता नहीं मंदा।
सियासी वस्त्र है ऐसा, कभी होता नहीं गंदा।
सफेदी में छिपा लेता, सभी गुनाह ये अपना,
सदा झोली भरी होती,सभी से मांग के चंदा।।

सियासी खेल है ऐसा,विवादों को रखे जिंदा
विवादों से सियासत है,करे कोई भले निंदा।
मवाली भी बना बैठा,हमारा आज का नेता,
जमीरों का करे सौदा, कभी होता न शर्मिंदा।।


©पंकज प्रियम

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