KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

आजा अब परदेशिया

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आजा अब परदेशिया

आजा अब परदेशिया , तरस रहे हैं नैन ।
बाट जोहती हूँ खड़ी , पल भर खोजूँ चैन ।।
पल भर खोजूँ चैन , लगे जग सारा सूना ।
सावन भादो मास , अश्रु अब बढ़ते दूना ।।
कह ननकी कवि तुच्छ , झलक अपना दिखला जा ।
मिलन करो मनमीत , शीघ्रता से घर आजा ।।

आजा मेरे गाँव में , न्यौता देता आज ।
बागीचे हैं प्यार के , बजे यहाँ शुभ साज ।।
बजे यहाँ शुभ साज , शांति चहुँदिशि है छाई ।
प्रेम और विश्वास , गान स्वागत सुखदाई ।।
कह ननकी कवि तुच्छ , पता अपना बतला जा ।
आमंत्रण स्वीकार , परम सुख पाने आजा ।।

आजा मन सत्संग में ,जो चाहो विश्राम ।
दौड़धूप की जिंदगी , त्याग जगत के काम ।।
त्याग जगत के काम , कभी सब भार उतारो ।
पाले परमानंद , भाग्य को स्वयं सँवारो ।।
कह ननकी कवि तुच्छ ,सुनो तुम अनहद बाजा ।
नित्य शांति अभ्यास , हेतु अब तो आजा ।।

---- रामनाथ साहू " ननकी " मुरलीडीह