KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

वर्षा जैन “प्रखर”दुर्ग (छत्तीसगढ़)की कविता-आओ मिलकर एक नया ख्वाब सजायें

174
*******************
सपने कभी सुनहले कभी धुंधले से
आँखों के रुपहले पर्दे पर चमकते से
बुन कर उम्मीदों के ताने बाने
हम सजाते जाते हैं सपने सुहाने
कनकनी होती है तासीर इनकी
मुक्कमल नहीं होती हर तस्वीर जिनकी
सपनों को नही मिल पाता आकार
मन के गर्त में रहते हैं वो निराकार
टूटते सपनों की तो बात ही छोड़िये जनाब
जिन्हें फिर से समेटना भी है एक ख्वाब
बहने वाले हर आँसू को सहेजना मुमकिन नहीं
टूटे सपनों को फ़िर से संजोना मुमकिन नहीं
फूल तो फिर भी मुरझा कर
बन बीज धरा में मिल जाते हैं
अपने जैसे सुमन को फिर से उपजाते हैं
टूटे सपनों को कैसे समेटुं
कांच कहाँ फिर से जुड़ पाते हैं
आँखों के बहते हर आँसू में 
टूटे सपनों की मिलावट होती है
काश वो सपने ही ना पलें आँखों में 
जिनकी नियति ही टूटने में होती है
कभी धन की कमी, कभी शरीर निर्बल
अपनों ने दिया धोखा, कभी मन हो गया शिथिल
धराशायी हो जाते हैं तब सपने
जब उनको नहीं मिल पाता कोई क्षितिज
आओ मिलकर एक नया ख्वाब सजायें
मुकम्मल सा इक जहाँ बनायें
मेरे सपनों को तुम सँवार देना
तुम्हारे ख्वाबों को मै सहेज दूँगी
आओ मिलकर एक नया ख्वाब सजायें
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
वर्षा जैन “प्रखर”
दुर्ग (छत्तीसगढ़)

Comments are closed, but trackbacks and pingbacks are open.