KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

आरक्षण का बाना- मनीभाई नवरत्न

आरक्षण देश के लिए एक गंभीर मुद्दा है । लोग आरक्षण के पक्ष में खड़े हो रहे हैं और कई इसके विपक्ष पर । इसी पर आधारित कविता को पढ़िये

तथाकथित उच्च वर्ग
जवाब मांग रहा है,
निम्न वर्ग से –
‘रे अछूत !
तुझे लज्जा नहीं आती।
आरक्षण के दम पर
इतरा रहा है ।
हमारे हक का खा रहा है ।
तेरी औकात क्या ?
तेरी योग्यता क्या ?
भूल गया अपना वर्चस्व ,
भुला दी तूने ,
मनुस्मृति की लक्ष्मण रेखाएं ।
संविधान को कवच बनाकर
तू उत्छृंलन हो गया है।
पैरों के दासी ,
अपने पैरों में खड़ा होने की,
कोशिश मत कर ।
हिम्मत है तो, द्वंद कर ।
आरक्षण का बाना हटा
मुझसे शास्त्रार्थ कर ।’

व्यंग्य की बाणों से ,
जख्मी ने प्रत्युत्तर दिया-
” वाह रे कुलश्रेष्ठ !
तू बोलता है कि
मैं ब्रह्मा के मुख से पैदा हुआ हूं ।
तेरे मुख से ये कुटिल बातें ,
शोभा नहीं देती ।
तूने कहा ,जातियां जन्मजात हैं
हमने मान लिया ।
फिर कहा ,
प्रत्येक जाति के कर्म विधान हैं ।
हमने स्वीकार लिया ।
सौभाग्य माना हमने,
जन सेवा करके ।
नव निर्माण करके
जग का श्रृंगार किया ।
अति प्राचीन
भारतीय संस्कृति को आधार दिया ।
सामाजिक नियमों में बांधकर
तूने जी भर शोषण किया ।
धर्म और ईश्वर के नाम पर
भयभीत किया ।
पर अपने लिए नियम
लचीला रखा,
जब अपनी स्वार्थ पूरी करनी थी।
हमने जब सीमाएं तोड़ी ,
तो नर्क का दंड विधान किया ।
वो तो खुश किस्मत हुए
कि संविधान का रास्ता दिखा ।
हमारे विकास के लिए
एक अवसर दिखा।
आज तुम्हें इस बात का कष्ट है-
कि हमने शिक्षामृत चखा ।
वर्षों से छीना गया अधिकार को परखा।

आज तुम्हें तकलीफ है,
क्यों हम सेवा क्षेत्र में आरक्षित हैं ?
तो सुन तेरे शब्दों में,
“शूद्रों के लिए सेवा का क्षेत्र हो ,
यह भी तो तेरी मनुस्मृति की देन है।”
मुझे शौक नहीं कि
आरक्षण के नाम पर
समाज से सहानुभूति मिले ।
जातिगत भेदभाव टूटे ,
समभाव से प्रकृति खिले ।
योग्य का चुनाव हो ,
आरक्षण की दीवार हटा दो ।
परंतु उससे पहले ,
जाति की अवधारणा मिटा दो।
कोई सवर्ण नहीं ,
कोई अवर्ण नहीं ।
सब प्रकृति की है संतान ।
जातियों में बंटकर
अलग ही रहेंगे ,
नहीं बनेगा कभी भी,
अपना भारत महान।

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