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आता देख बसंत

छप्पय छन्द में बसंत पंचमी पर रचना

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आता देख बसंत
आता देख बसंत, कोंपलें तरु पर छाए।
दिनकर होकर तेज,शीत अब दूर भगाए।।
ग्रीष्म शीत का मेल,सभी के मन को भाए।
कलियाँ खिलती देख, भ्रमर भी गीत सुनाए।
मौसम हुआ सुहावना,स्वागत है ऋतुराज जी।
हर्षित कानन बाग हैं,आओ ले सब साज जी।।

यमुना तट ब्रजराज, पधारो मोहन प्यारे।
सुंदर सुखद बसंत ,सजे नभ चाँद सितारे।।
छेड़ मुरलिया तान, पुकारो अब श्रीराधे।
महाभाव में लीन, हुई हैं प्रेम अगाधे।।
देखो गोपीनाथजी, आकुल तन मन प्राण हैं।
रास करें आरंभ शुभ,दृश्य हुआ निर्माण है।।

धरा करे श्रृंगार,पुष्प मकरंद सँवारे।
कर मघुकर गुंजार,मधुर सुर साज सुधारे।।
बिखरा सुमन सुगंध, पलासी संत सजारे।
आया नवल बसंत,मिलन हरि कंत पधारे।।
आनंदित ब्रजचंद हैं,सुध बिसरी ब्रजगोपिका।
ब्रज में ब्रम्हानंद है,श्रीराधे आल्हादिका।।

-गीता उपाध्याय'मंजरी' रायगढ़ छत्तीसगढ़

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