KAVITA BAHAR
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आजादी और बंधन- मनीभाई नवरत्न

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आजादी और बंधन

मैं खोज रहा आजादी
जो मिला है मुझे
उपहारस्वरूप जन्म से।
फिर कहाँ तलाशता चारों ओर ?
भटकता उसके लिए।

अरे! यही मानवीय दशा
कि होता जो पास में
रहता नहीं मूल्य उसका ।
क्या ऊँचे कद आदमी के लिए
आसान होता देख पाना
अपने पैरों तले जमीन
जिस पर वह टिका है।

तार्किक वन में
छलांग लगाता बैचेन मृग
कस्तूरी पाने को नाहक।
फिरता समझदार बन ,
खास होने की नशा में।
जो आम है वो भी
असल चीज “आजादी” छोड़
खास होने की रंग में
रंगने के लिए
कतार बद्ध खड़े हैं।
क्या संभव है?
राजसी ठाट बाट में
जिसे वह खोजना चाहता ।

मैं होना चाहता
सच्चा सामाजिक
बन देश सिपाही
पहचान चाहता हूँ भीड़ में।
चिंता मुझे
अपने व्यक्तित्व का।
एक रस हो जाना चाहता हूँ
दुनिया पिंजर में ।

क्या भला !
पक्षी भर सकता उड़ान
बंद पिंजरों में।

सत्य अमर है,
उसमें बनावट नहीं
सादा स्पष्ट और सरल।
वैसे ही जैसे आजाद होना ।
दुनिया के सारे कर्म ,
बंधन के हैं।
जिसने माना इसे ,
असल जीवन आनंद के।
वह फंसता गया कारागार में।

यहाँ सुख है उतना ही ,
जितना दुख है।
यहाँ भोजन भी है,
चूँकि जिह्वा में स्वाद है
और पेट में भूख भी।

आसान नहीं ,
छप्पन भोग के सामने
उपवास का विचार ।
गर ऐसा कर सके
तो मिल सकती है आजादी।

मैं झूलता ही पाया
अपने को पेंडुलम की भांति
आजादी और बंधन के बीच।
मैं रहना चाहता हूँ ,
अपनों के संग।
पर घुल नहीं पाता।
तली में बैठ जाता हूँ
अवक्षेप भांति I
यही मेरी मौलिक प्रवृत्ति
जो मिला है मुझे उपहार में I
मूलतः मैं आजाद हूँ।
बंधक तब-तब
बन जाता हूँ
जब मैं खोजना चाहता
इसे अपनों के बीच।

मनीभाई नवरत्न

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