KAVITA BAHAR
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अब तो बस प्रतिकार चाहिए

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अब तो बस प्रतिकार चाहिए

आज लेखनी तड़प उठी है
भीषण नरसंहार देखकर।
क्रोध प्रकट कर रही है अपना
ज्वालामुखी अंगार उगलकर।
दवात फोड़कर निकली स्याही
तलवारों पर धार दे रही।
कलम सुभटिनी खड्ग खप्पर ले
रण चण्डी सम हुँकार दे रही।
जीभ प्यास से लटक रही
वैरी का शोणित पीने को।
भाला बनकर आज भेद दूँ
आतंकी के सीने को।
अबकी होली में आतंकी
को होलिका बनाउंगी।
फिर से सुत प्रह्लाद की खातिर
वैरी चिता सजाऊँगी।
बनूँ कृष्ण गाण्डीव उठाऊँ
अब तो बस प्रतिकार चाहिए।
नापाक इरादे दुर्योधन का
कलयुग में संहार चाहिए।
न देखो बाट इशारे की
सत्ता क्या निर्णय लेगी।
सब राजनीति की मिलीभगत
बन मूक चूड़ियाँ पहन लेगी।
शंखनाद कर बिगुल बजाकर
रणभेरी मैं बन जाऊँगी।
बनकर बरछी ढाल कटारी
दुश्मन को मजा चखाऊँगी।
कसम है उसके घर में घुसकर
शीश हाथ से काटूँगी।
मुण्ड माल को पहन गले में
भैरवी बनकर नाचूँगी।
देखकर मेरा भीषण ताण्डव
जर्रा जर्रा थर्राएगा।
युगों युगों तक पाकिस्तान भी
वन्देमातरम गायेगा।
स्वरचित
वन्दना शर्मा”वृंदा”
अजमेर

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