KAVITA BAHAR
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अन्नदाता की व्यथा

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अन्नदाता की व्यथा

हे जगत के अन्नदाता,
तू ही अनेक फसल उपजाता,
रहकर दिन-रात खेतों में
जन-जन को अन्न पहुँचाता,
तेरे उपजे अन्न को
खाते सब पेट भर
फिर –
खाली पेट तू सोता क्यों….
बदहालात पर रोता क्यों….

आग उगलती, जेठ की धूप में,
नंगे पाँव तपती रेत में,
नामोनिशान न कही हरियाली का
तू बीज खेतों में बोता हैं,
कपास की फसल उगाता हैं,
तेरी उपजी कपास से
ढकता जग सारा तन अपना
फिर –
नंगे बदन तू फिरता क्यों …
फटे-पुराने चिथड़े पहनता क्यों….

गड़-गड़-गड़-गड़ बादल गरजे,
कड़-कड़-कड़-कड़ बिजली कड़के,
मूसलाधार बरसातों में,
ओलावृष्टि व तूफानों में,
तू कच्ची फसल पकाता है
अपनी खेती बचाता है
फिर –
बाढ़ में तू बहता क्यों ….
दिन रात पिटता क्यों….

पौह-माह की शरद बरसातों में,
ओस-धुंध, बर्फीली रातों में,
घर से कोई बाहर न निकले
आठों पहर धूप को तरसे
शीत लहर के प्रकोपों में
गेहूं की फसल उगाता है,
जन-जन को अन्न पहुंचाता हैं,
फिर –
तेरे बच्चे भूखे-प्यासे रोते क्यों….
तुम खुदकुशी के शिकार होते क्यों…

बलबीर सिंह वर्मा “वागीश”
गॉंव – रिसालियाखेड़ा
जिला – सिरसा (हरियाणा)

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